Monday, July 2, 2012

कैसी कैसी स्क्रीन

एमोलेडः एमोलेड का आशय है एक्टिव मैट्रिक्स ऑर्गैनिक लाइट-इमेटिंग डायोट। इस तकनीक का उपयोग टीवी और मोबाइल डिसप्ले के लिए किया जाता है। आज ज्यादातर स्मार्ट फोन के डिसप्ले में इसी तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। सर्वप्रथम इसका उपयोग सैमसंग के फोन में देखने को मिला था। आम स्क्रीन की अपेक्षा इसमें चीजें 20 फीसदी तक ज्यादा स्पष्ट दिखाई देती हैं। इसके साथ ही बैटरी खपत भी अन्य स्क्रीन की अपेक्षा कम है। इसका विकास खासकर टच आधरित बड़े स्क्रीन वाले फोन के लिए किया गया है।  आज सैमसंग, नोकिया, एलजी, सोनी एरिक्सन और एचटीसी सहित कई कंपनियों द्वारा एमोलेड स्क्रीन का उपयोग किया जा रहा है।

सुपर एमोलेडः एमोलेड तकनीक का यह उन्नत संस्करण है। इसका उपयोग खासतौर से मोबाइल फोन में देखने को मिलता है। भारत में सैमसंग गैलेक्सी एस पहली डिवायस है जिसमें सुपर एमोलेड डिसप्ले का उपयोग किया गया था। यह तकनीक एमोलेड से ज्यादा एडवांस है और धूप में भी चीजें स्पष्ट दिखाई देती हैं। साधारण स्क्रीन तकनीक से 30 फीसदी तक पावर खपत कम करने में सक्षम है।  सुपर एमोलेड के बाद इसका एचडी संस्करण का उपयोग सैमसंग नोट में देखने को मिला है।

सुपर एमोलेड प्लसः जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है यह तकनीक एमोलेड और सुपर एमोलेड से ज्यादा एडवांस है। यह न सिर्फ बेहतर डिसप्ले में सक्षम है बल्कि सुपर एमोलेड की अपेक्षा 18 फीसदी तक बैटरी बचत करने में सक्षम है। वहीं सूर्य की रोशनी में भी चीजें बेहतर तरीके से देखी जा सकती हैं। सैमसंग गैलेक्सी एस टू में इसका उपयोग पहली बार देखा गया है।

रेटिना डिसप्लेः डिसप्ले की इस तकनीक का उपयोग खासतौर से एपल डिवायस में देखने को मिला है। सबसे पहले आईफोन 4 में इसका उपयोग किया गया था जिसमें 3.5 इंच का डिसप्ले है। इस तकनीक के तहत डिसप्ले में एक इंच में 326 पिक्सल का उपयोग होता है। कंपनी दावा करती है कि मनुष्य की आंख के रेटिना में किसी तस्वीर निर्माण में 326 पिक्सल का उपयोग होता है। इस वजह से यह साधारण डिवायस की अपेक्षा ज्यादा बेहतर तरीके से चीजों के प्रदर्शन में सक्षम है। इसके अलावा 80 डिग्री तक स्क्रीन के घुमाव की स्थिति में भी आप चीजों को बेहतर तरीके से देख सकते हैं।

आईपीएसः आईपीएस का आशय है इन प्लान स्विचिंग। कई कंपनियों द्वारा डिसप्ले के लिए इस तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। हिताची लिमिटेड द्वारा यह तकनीक विकसित की गई थी। यह खासतौर से बेहतर डिसप्ले और स्क्रीन घुमाव की स्थिति में भी चीजों के प्रदर्शन के लिए जाना जाता है।

नोवा डिसप्लेः नोवा डिसप्ले का उपयोग सबसे पहले एलजी आप्टिमस ब्लैक में देखने को मिला था। कंपनी दावा करती है कि यह साधरण डिसप्ले से 50 फीसदी तक बैटरी खपत कम करने में सक्षम है। इसकी बेहतर ब्राइटनेस क्षमता डिसप्ले को और भी शानदार बनाती है जिससे ब्राउजिंग क्षमता और डाक्यूमेंट इत्यादि पढ़ने में आपको आसानी हो। साथ ही सूर्य की तेज रोशनी में भी स्क्रीन पर चीजों का प्रदर्शन साफ और स्पष्ट होता है।

क्लिर ब्लैक डिसप्लेः हाल ही में डिसप्ले की यह तकनीक भी बेहद चर्चा में रही है। हाल में नोकिया लुमिया 800 और लुमिया 710 में इस तकनीक का उपयोग किया गया है। यह तकनीक स्क्रीन पर एक ब्लैक लेयर बनाती है  जो बाहर से डिवायस पर पड़ रही किरणों के रिफ्रलेक्शन को रोकती है। जिससे स्क्रीन तेज धूप में भी बेहतर प्रदर्शन कर सके। वहीं ब्लैक लेयर सफेद की अपेक्षा बैटरी खपत को भी कम करता है।

गोरिल्ला ग्लासः गोरिल्ला ग्लास तकनीक को कोर्निंग कंपनी द्वारा तैयार किया गया है। इसका प्रयोग खासतौर से पोर्टेबल इलेक्ट्रानिक डिवायस के लिए किया जाता है। यह स्क्रीन को मजबूती प्रदान करता है जिससे कि गिरने के दौरान टूटे-फूटे न।

ओलियोफोबिक कोटः
इस तकनीक का उपयोग स्मार्ट टचस्क्रीन फोन में देखने को मिल रहा है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है यह एक प्रकार की कोटिंग है जो स्क्रीन पर की जाती है। इससे साधरण स्क्रीन के मुकाबले ओलियोफोबिक स्क्रीन थोड़ी सख्त हो जाती है जो स्क्रीन पर बाहरी प्रभाव से हो रहे नुकसान को काफी हद तक कम करने में मदद करता है। जैसे यह टूटने, रगड़ लगने और उंगलियों के निशान इत्यादि को रोकती है।

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