काश हर दिन संडे होता
‘काश हर दिन संडे होता’ यह बात कोई 5 या छह साल का बच्चा नहीं बोल रहा है जो स्कूल जाने से डरता है। बल्की 32 साल का इंसान बोल रहा है जो अपने परिवार का जीविका चलाने के लिए किसी रोजगार से जुड़ा है।
इन बातों से लोग यही समझ रहे होंगें कि बेचारा काम के बोझ से दबा है और संडे को एक दिन के लिए छुट्टी मिली तो यह कह डाला कि ‘काश हर रोज संडे होता।’ लेकिन ऐसा नहीं है। सातों दिन में संडे ही एक ऐसा दिन है जब हम ऑफिस में चैन से काम निपटा पाते हैं। आज ही देख लीजिए। एक कूर्सी पर बैठी हिना शांति से अपनी स्टोरी लिख रही है। वहीं दूसरी ओर हर्षिता दो कूर्सियों पर अपने पैर जमाएं लैप टाप पर बिना किसी से कुछ कहे काम कर रही है। अजीत पाराशर को भी पफोन से पफुर्शत मिल जाती है तो चुप-चाप डिजाइनिंग कर लेते हैं। और चैहान साहब भी एक कोने में बैठे यूट्यूब पर कुछ देखते हुए अपना काम निपटा रहे हैं।
यह शांति कितनी प्यारी है। लोग चुप-चाप ढेर सारा काम भी कर लेते हैं और ऑफिस आकर अच्छा भी लगता है। लेकिन इस शांति के बाद जब कल के बारे में सोचता हूं तो पफर चेहरे पर मायूसि होती है और दिल कहता है ‘काश हर दिन संडे होता।?’
‘काश हर दिन संडे होता’ यह बात कोई 5 या छह साल का बच्चा नहीं बोल रहा है जो स्कूल जाने से डरता है। बल्की 32 साल का इंसान बोल रहा है जो अपने परिवार का जीविका चलाने के लिए किसी रोजगार से जुड़ा है।
इन बातों से लोग यही समझ रहे होंगें कि बेचारा काम के बोझ से दबा है और संडे को एक दिन के लिए छुट्टी मिली तो यह कह डाला कि ‘काश हर रोज संडे होता।’ लेकिन ऐसा नहीं है। सातों दिन में संडे ही एक ऐसा दिन है जब हम ऑफिस में चैन से काम निपटा पाते हैं। आज ही देख लीजिए। एक कूर्सी पर बैठी हिना शांति से अपनी स्टोरी लिख रही है। वहीं दूसरी ओर हर्षिता दो कूर्सियों पर अपने पैर जमाएं लैप टाप पर बिना किसी से कुछ कहे काम कर रही है। अजीत पाराशर को भी पफोन से पफुर्शत मिल जाती है तो चुप-चाप डिजाइनिंग कर लेते हैं। और चैहान साहब भी एक कोने में बैठे यूट्यूब पर कुछ देखते हुए अपना काम निपटा रहे हैं।
यह शांति कितनी प्यारी है। लोग चुप-चाप ढेर सारा काम भी कर लेते हैं और ऑफिस आकर अच्छा भी लगता है। लेकिन इस शांति के बाद जब कल के बारे में सोचता हूं तो पफर चेहरे पर मायूसि होती है और दिल कहता है ‘काश हर दिन संडे होता।?’
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